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फ़्रांस के समर्थन में क्यों उतरा भारत, कैसे रहे हैं दोनों देशों के संबंध

बात 22 अगस्त 2019 की है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ़्रांस के दौरे पर थे. साझा प्रेस वार्ता चल रही थी.

प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक पत्रकार ने कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने को लेकर फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से सवाल पूछा.

जवाब में उन्होंने कहा, “फ़्रांस इस बात पर नज़र बनाए हुए है कि नियंत्रण रेखा के दोनों तरफ़ आम नागरिकों के अधिकार और हितों की अनदेखी ना हो.”

इसी मौक़े पर उन्होंने ये भी कहा कि उनकी प्रधानमंत्री मोदी से बात हुई है. मैक्रों का कहना था कि भारत और पाकिस्तान को ये बात ज़िम्मेदारी से समझनी होगी.

मैक्रों ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि दोनों देशों को आपसी बातचीत से अपने मतभेद दूर करने चाहिए और वे यही बात पाकिस्तान के लिए भी कहेंगे.

अब बात 28 अक्तूबर 2020 की. फ़्रांस में इस्लाम को लेकर चल रहे ताज़ा विवाद पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने फ़्रांस के राष्ट्रपति का खुल कर समर्थन किया है.

भारतीय विदेश मंत्रालय ने बयान में कहा है, “अंतरराष्ट्रीय वाद-विवाद के सबसे बुनियादी मानकों के उल्लंघन के मामले में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के ख़िलाफ़ अस्वीकार्य भाषा में व्यक्तिगत हमलों की हम निंदा करते हैं. हम साथ ही क्रूर आतंकवादी हमले में फ़्रांसीसी शिक्षक की जान लिए जाने की भी निंदा करते हैं. हम उनके परिवार और फ़्रांस के लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हैं. किसी भी कारण से या किसी भी परिस्थिति में आतंकवाद के समर्थन का कोई औचित्य नहीं है.”

भारत से पहले जर्मनी, इटली और नीदरलैंड्स जैसे यूरोपीय देशों ने भी फ़्रांस के साथ मज़बूती से खड़े होने की बात कही थी.

गुरुवार को फ़्रांस के नीस शहर के एक चर्च में एक शख़्स ने चाक़ू से हमला किया जिसमें तीन लोगों की मौत हो गई. इस घटना के बाद भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट कर निंदा की. इसके बाद अमरीका, ब्रिटेन और रूस के भी बयान सामने आए हैं.

लेकिन भारत के भोपाल शहर में फ़्रांस के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हुआ.

भारत-फ़्रांस के रिश्ते

राकेश सूद, फ़्रांस में भारत के राजदूत रह चुके हैं.

भारत और फ़्रांस के रिश्तों को एक लाइन में समझाते हुए वो कहते हैं, “दोनों देशों के बीच मज़बूत दोस्ती है और समय-समय पर जब भी इसे जाँचा-परखा गया, हर बार ये बात सही साबित हुई है.”

फिर फ़्रांस के राष्ट्रपति कश्मीर में मानवाधिकार का मुद्दा क्यों उठाते हैं?

इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं, “फ़्रांस के सेक्युलरिज़्म की अपनी एक परिभाषा है, जिसके तहत कोई भी धार्मिक प्रतीक का प्रयोग पब्लिक में नहीं किया जाता. फ़्रांस में 80 फ़ीसदी से ज़्यादा लोग ईसाई हैं, लेकिन वहाँ धर्मनिरपेक्षता की इस परिभाषा को पूरी तरह से लागू किया जाता है. अगर वो हिजाब के लिए मना करते हैं तो क्रिश्चियन क्रॉस के लिए भी मना करते हैं. लेकिन भारत में सेक्युलरिज़्म अलग तरह का है. दोनों देशों में धर्मनिरपेक्षता की समझ अलग है.”

लेकिन राकेश सूद को लगता है कि केवल कश्मीर में मानावाधिकार की बात करने से ये नहीं समझा जा सकता कि भारत और फ़्रांस दोस्त नहीं हैं.

जाँ-जोसेफ़ बायलोट भी ये मानते हैं कि दोनों देशों में राजनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर बहुत अच्छे रिश्ते हैं. मोदी और मैक्रों के बीच की केमिस्ट्री शुरुआत से बहुत अच्छी है, लेकिन ऐसी ही केमिस्ट्री दोनों देशों की जनता के बीच भी हो, ये ज़रूरी नहीं है.

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