बीबीसी: रूस के राष्ट्रपति कार्यालय के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा है कि तेल की क़ीमतों में बढ़ोतरी और अमेरिका द्वारा रूसी ऊर्जा निर्यातकों पर लगाए गए प्रतिबंधों में अस्थायी ढील से रूस को ज़्यादा कमाई करने का मौक़ा मिलेगा. इसका सीधा मतलब यह है कि देश के बजट की आमदनी बढ़ेगी.
पिछले कुछ महीनों से रूस आर्थिक मुश्किलों से जूझ रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अमेरिका और इसराइल का ईरान के साथ युद्ध रूस की इन समस्याओं को हल कर सकता है? इस सवाल का जवाब काफ़ी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि मध्य पूर्व में यह युद्ध किस दिशा में जाता है और तेल की ऊंची क़ीमतों का दौर कितने समय तक बना रहता है.
युद्ध के पहले हफ़्ते में बाज़ार काफ़ी हद तक शांत नज़र आया. क़ीमतें धीरे-धीरे बढ़ रही थीं, लेकिन न तो बाज़ार में घबराहट दिखी और न ही क़ीमतों में कोई अचानक उछाल आया. ज़्यादातर विश्लेषकों को उम्मीद थी कि यह युद्ध जल्दी ख़त्म हो जाएगा.
लेकिन जैसे-जैसे संघर्ष लंबा खिंचता गया, इस टकराव के लंबे समय तक चलने की आशंका भी बढ़ती गई. इसी बीच दुनिया के सबसे अहम तेल व्यापारिक रास्तों में से एक, होर्मुज़ जलडमरूमध्य में संभावित रुकावट की चिंता ने हालात को और गंभीर बना दिया. इतिहास में कच्चे तेल की सबसे बड़ी रुकावट
ईरान के तेल वैश्विक आपूर्ति में लगभग 3.5 प्रतिशत हिस्सेदारी है और इसकी सप्लाई में रुकावट से दुनिया के तेल बाज़ार के संतुलन पर बहुत बड़ा असर पड़ने की संभावना कम है.
