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Monday, February 16, 2026

दिमाग से जुड़े किसी भी लक्ष्ण को न करें नजरअंदाज: डा. संदीप शर्मा

जालंधर, 10 दिसंबर (न्यूज़ हंट)- यदि समय पर जांच करवा ली जाए तो एक लक्ष्ण से बीमारी की असली स्थिति का पता लग जाता है। ऐसे में उक्त लक्ष्ण दिमाग से जुड़ा हुआ हो तो थोड़ी से बरती लापरवाही से व्यक्ति ब्रेन स्ट्रोक (दिमाग का दौरा) पडऩे के कारण एक जटिल दिमागी बीमारी की चपेट में आ सकता है। आज ब्रेन स्ट्रोक/अधरंग जैसे रोग संबंधी जागरूकता पैदा करने के लिए जाने माने इंटरवेंशनल न्यूरोरेडयोलॉजिस्ट डा. संदीप शर्मा जालंधर पहुंचेे।

फोर्टिस अस्पताल मोहाली के न्यूरो इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी विभाग के एडिशनल डायरेक्टर डा. संदीप शर्मा ने कहा कि न्यूरो से संबंधित बीमारियों के लक्ष्ण दिमागी हालत से जुड़े होते हैं, जिनमें भूल जाना, चेतना की कमी, एक दम व्यक्ति के व्यवहार में बदलाव आना, क्रोधित होना व तनावग्रस्त आदि लक्ष्ण शामिल हैं। उन्होंने कहा कि यदि न्यूरोलॉजी से संबंधित मरीज का इलाज नहीं करवाया जाता तो इसके गंभीर परिणाम निकल सकते हैं। उन्होंने कहा कि ब्रेन स्ट्रोक (दिमागी दौरा) पडऩे पर यदि मरीज को तुरंत ऐसे अस्पताल जहां अनुभवी न्यूरोलॉजिस्ट व न्यूरो सर्जन हों तो मरीज जल्द स्वस्थ व अधरंग के असर को कम या खत्म किया जा सकता है।

डा. शर्मा ने बताया कि हाल ही में ब्रेन हेमरेज से ग्रस्त जालंधर की रहने वाली 51 वर्षीय जसबीर कौर उनके पास पहुंची। दिमाग में खून का दबाव बढऩे से वह बेहोशी की हालत में जा सकती थी या मौत भी हो सकती थी। डा. शर्मा ने बताया कि फ्लो डायवर्टज की मदद से दिमाग की फूली नस यानि एन्यरिजम में काइल्ज डाली गई तथा आज वह पूरी तरह से स्वस्थ है। उन्होंने कहा कि दिमागी दौरा या लकवा मारने पर बिल्कुल भी घबराने की जरूरत नहीं है। उन्होंने बताया कि ब्रेन स्ट्रोक के उपचार में क्रांतिकारी बदलाव आने से गंभीर से गंभीर मरीज स्वस्थ हो रहे हैं।

डा. शर्मा ने बताया कि एक अन्य 70 वर्षीय मरीज केवल कृष्ण चथरथ जिसके कि दिमाग की नाड़ी में खून का कतला (कलॉट) बन गया था, का मकेनिकल थ्रोम्बैक्टमी तकनीक द्वारा इलाज किया गया तथा पांच दिन के अंदर ही मरीज तंदरूस्त हो गया। डा. संदीप शर्मा ने बताया कि दिमाग की नाड़ी फटने या दिमाग में खून का कलॉट जम जाने की स्थिति में फ्लो डायवर्टज तथा मैकेनिकल थ्रोम्बैक्टमी द्वारा कामयाबी से इलाज किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि स्ट्रोक के 24 घंटों के अंदर-अंदर मैकेनिकल थ्रोम्बैक्टमी द्वारा इलाज करके मरीज की जान बचाई जा सकती है तथा वह जल्द ही पहले की तरह कामकाज कर सकता है।

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